उत्तराखण्ड
7 सितम्बर 2026
प्रदेश के सभी विद्यालयों में होगा एंटी ड्रग सेल का गठन
देहरादून। उत्तराखंड के स्कूलों को नशामुक्त बनाने के लिए शिक्षा विभाग ने 2026 से 2029 तक विशेष अभियान चलाने का रोडमैप तैयार किया है. अभियान को चार चरणों में लागू किया जाएगा. स्कूलों में एंटी ड्रग सेल गठित करने के साथ नोडल शिक्षक नियुक्त होंगे, जो छात्रों में नशे की प्रवृत्ति की शुरुआती पहचान करेंगे. जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग और विशेषज्ञों की मदद भी उपलब्ध कराई जाएगी. अभिभावकों के साथ स्वास्थ्य, पुलिस और समाज कल्याण विभाग का सहयोग भी लिया जाएगा.
उत्तराखंड के स्कूलों में बच्चों को नशे की लत से बचाने और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण तैयार करने के लिए सरकार ने बड़ा अभियान शुरू करने का फैसला किया है. राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की ओर से नशा मुक्त देवभूमि एवं नशा मुक्त विद्यालय अभियान 2026-2029 का रोडमैप तैयार किया गया है. इस योजना के तहत सरकारी और निजी दोनों तरह के शिक्षण संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रमों के साथ एक व्यवस्थित तंत्र विकसित किया जाएगा. जिससे बच्चों में नशे की प्रवृत्ति की समय रहते पहचान की जा सके. उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा सके.
शिक्षा विभाग के अनुसार अभियान का उद्देश्य केवल नशे के दुष्प्रभाव बताना नहीं है, बल्कि विद्यालयों को सुरक्षित, संवेदनशील और सहयोगात्मक वातावरण के रूप में विकसित करना भी है. इसके लिए स्कूलों में विशेष व्यवस्थाएं तैयार की जाएंगी. शिक्षकों को भी नई जिम्मेदारियां दी जाएंगी.
सरकार ने इस अभियान को चार चरणों में लागू करने की तैयारी की है. पहले चरण में वर्ष 2026 के दौरान संस्थागत ढांचे का निर्माण किया जाएगा. स्कूलों की क्षमता बढ़ाने पर जोर रहेगा. दूसरे चरण में वर्ष 2027 के दौरान जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार किया जाएगा. अधिक से अधिक छात्रों को अभियान से जोड़ा जाएगा. तीसरे चरण में 2028 में कार्यक्रमों का मूल्यांकन और उन्हें और प्रभावी बनाने का कार्य होगा, जबकि 2029 तक स्कूलों के लिए स्थायी व्यवस्था और प्रमाणन प्रणाली विकसित करने की योजना है.
अभियान के तहत प्रदेश के सभी विद्यालयों में एंटी ड्रग सेल का गठन किया जाएगा. प्रत्येक स्कूल में प्रशिक्षित नोडल शिक्षक नियुक्त किए जाएंगे, जो बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर नजर रखेंगे. जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों से संपर्क स्थापित करेंगे. इसके साथ ही परामर्श और रेफरल व्यवस्था भी विकसित की जाएगी, ताकि जोखिम वाले छात्रों को समय रहते सहायता मिल सके.
योजना के अनुसार विद्यालयों में जीवन कौशल आधारित शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, परामर्श सेवाएं और डिजिटल निगरानी प्रणाली पर भी काम किया जाएगा. इसके लिए शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण कराया जाएगा. अभिभावकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी.
एससीईआरटी की ओर से तैयार किए गए प्रारूप में सात प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है. इनमें जागरूकता अभियान, प्रारंभिक पहचान, परामर्श, रेफरल प्रणाली, पुनर्वास, समन्वय और अनुश्रवण शामिल हैं. इन बिंदुओं के आधार पर हर स्कूल में कार्ययोजना बनाई जाएगी. किशोरावस्था में बच्चों पर साथियों का प्रभाव अधिक होता है, ऐसे में समय रहते सही जानकारी और परामर्श उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है. यही कारण है कि शिक्षा विभाग अब केवल चेतावनी देने के बजाय एक संस्थागत व्यवस्था तैयार करने पर जोर दे रहा है.
